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सोमवार, अप्रैल 26, 2010

Taabar Toli 16 - 30 April 2010 Page 4

6 टिप्‍पणियां:

  1. 'टाबर टोळी' पखवाडि़यो गज़ब रो अखबार है। टाबर हरमेस इण री उडीक करै। खास बात आ है कै इण रा देखभाळ करणवाळा भाई दीनदयालजी रो ब्‍यौवार अर दीठ टाबरां जेड़ी है, क्‍यूं कै वै खुद एक चावा बाल साहित्‍यकार है। इणी कारण अखबार में टाबरां री हरेक रूचि मुज़ब ओळ्यां हुवै।


    म्‍हैं पढूं, आप पढ़ो ------- टाबरां नै पढ़ावो -------- टाबर टोळी, गटारोळी।

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  2. बड़ी बात तो कोई भी कर सकता हैं.....बड़ों के समझ में आने वाली भी कहना आसन हैं..पर बच्चो के लिए बच्चा बन के उनकी जुबानी लिखना....उनकी दिल कि समझना ये काम सिर्फ दीनदयालजी आप ही कर सकते हैं....दूर से देखने पर लोग बड़े जो नजर आते हैं...ना जाने क्यों पास जाने पर छोटे होते जाते हैं..पर आप उनके लिए लिखते हो..जो दूर से छोटे पर पास जाने पर बाद नजर आते हैं.....मेरी शुभकामनायें हमेशा आपके साथ हैं|

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  3. टाबर टोली देखकर मन बच्‍चों की तरह खिल उठा है।

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  4. ताज़ा पोस्ट पढ़ा ज़ाहिर है अच्छा-अच्छा लगा. टाबरटोली यूँ तो बच्चों का अखबार है लेकिन सामग्री ऐसी है जो बड़ों को भी वो सब सिखाती है जो बड़े "बड़े" होने के कारण सीखना नहीं चाहते खैर इसी तरहा बच्चों को बड़ा और बड़ों को ज़हनी तौर पर बड़ा करते रहें , शुभकामना

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  5. सर्वप्रथम श्रद्धेय श्री दीनदयालजी को सादर प्रणाम। बच्‍चे जो परमात्‍मा का ही रूप होते हैं और एक तरह श्री दीनदयालजी ने बच्‍चों के लिये 'टाबर-टोळी' के माध्‍यम जो सुनहरी दुनिया संजाई है, वो ईश्‍वराधना से कम नहीं है मेरे नजरिये से| आज के इस युग में जहां सबको अपने नाम की पडी है और बच्‍चों के लिये सोचने की किसको पडी है, वहां अपना कीमती समय बच्‍चों को देना बहुत बडी बात होती है| मैं आदरणीय डिम्‍पल माहेश्‍वरी जी की बात से बिलकुल हूं| श्री दीनदयालजी की गुरूता के बारे में कहूंगा कि जैसे बिहारी जी ने कहा है कि ''या अनुरागी चित्‍त की मति समझेना कोई, ज्‍यों-यों बूडे श्‍याम रंग त्‍यों-त्‍यों उज्‍ज्‍वल ||होई''
    इसीलिये श्रीदीनदयाल जी जैसे-जैसे बच्‍चों की दुनिया में रंग भरते हैं, वैसे-वैसे ही उनका व्‍यक्तित्‍व और बडा होता जाता है |पं. नहरूजी जी भी ये राज जान चुके थे कि जो सुख और सुकून बच्‍चों की दुनिया में है वो और कहीं नहीं इसीलिये उनको बच्‍चे बहुत प्रिय थे | आपका भी बच्‍चों के प्रति इतना प्‍यार-दुलार देखकर आपको 'चाचा दीनदयाल'कहने को मन करताह है |
    आपको बहुत-बहुत बधाई और प्रभु से यही प्रार्थना है कि आप ऐसे ही बच्‍चों की दुनिया में ऐसे ही अपने प्‍यार से रंग भरते रहें | और हां, अगर हो सके तो आपके 'टाबर-टोळी' का हिस्‍सा मैं भी बनना |चाहूंगा
    बहुत-बहुत आभार ।। प्रणाम ।।

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  6. अच्छा लगा टाबर टोली को पढ़ना. ये बच्चों का ही नहीं बड़ों का भी है क्योंकि हर बड़े के दिल में भी एक बच्चा रहता है

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